आज़ादी या अकेलापन?

जब शाम ढले, पर कोई राह न देखे,

सुबह उजाले में, कोई संग ना चले।

राहें खुली हों, मगर मंज़िलें धुंधली,

कोई रोकने वाला न हो, न कोई संभाले।

ख़्वाबों का शहर हो, पर सन्नाटे गहराए,

शब्दों का समंदर हो, पर जज़्बात जम जाएं।

खुला आसमान हो, मगर परों में भार हो,

सफ़र तो हो, पर हमसफ़र की दरकार हो।

क्या यही आज़ादी है, जो दिल को रास आए?

या फिर ये तन्हाई है, जो धीरे-धीरे खाए?

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I am Ajay Bhadoo. IAS Officer, serving as Joint Secretary to the President of India.

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